Saturday, June 27, 2009

समता दृष्टि कल्याणकर है.

असुर्या
नाम ते लोका अन्धेन तमसावृता |
तांस्ते प्रेत्याभिगचंन्ति ये के चात्महनो जनाः ||
उपनिषद् कहता है की जो समस्त प्राणियों को आत्मा में देखता है और आत्मा को समस्त प्राणियों में देखता हा, वहा किसी से घृणा नहीं करता। (ईशावास्योपनिषद, ३)
इस उत्तम भावः को लेकर संसार में बड़ा भरम है। वहा यह है की जीव एक ही है. अर्थात आत्मा एक है। हम इसी बहुत बातें करते है जो परम्परा से केवल सुनते आए हैं। उस पर स्वयं विचार नही करते। जो बात विवेक में न आए, उसे केवल सुन-सुन कर दोहराते जन, समझदारी नही है।
प्रस्तुत मंत्र का अभिप्राय है की व्यक्ति अपने ही समान सबको समझता है वह किसी से घृणा नही करता। सभी प्राणियों में अपने आत्मा को देखना तथा अपनी आत्मा में सभी प्राणियों देखता है। वहा सबको सामान समझकर हृदय से द्वेष, घृणा, हिंसा आदि सारे दुर्भाव एवं दुष्कर्म त्याग कर सबसे प्रेम करता है।

शुभम....